धूप आने दो हमारे पास ..[कविता]...श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
धूप आने दो हमारे पास सूरज है हमारा भी तुम हमारी ही जड़ों से ख़ाद पानी चूस कर इतरा रहे हो ? दर्प की हर शाख से हमको कुचलते जा रहे हो और कितने झोपड़ों को यों उजाड़ोगे.. ....? 'सत्तासुन्दरी' का साथ पाने के लिये… महल आलीशान की हर नींव में है दबा कोई हमारा...
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श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[12 Apr 2009 21:31 PM]



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