और तुम्हारा एक तकाजा
बुझे बुझे सरगम के सुर हैं थके थके सारे नूपुर हैं शब्दों का पिट गको आतुर है भावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैं और तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँ अक्षर अक्षर बिखर गई हैं गाथाय्रं कुब याद नहीं हैं शीरीं तो हैं बहुत एक भी लेकिन पर...
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Geetkaar
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[12 Apr 2009 21:04 PM]



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