लोकतंत्र का सर्कस - लोकतंत्र की हो रही सोलह दूनी आठ

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai १) एक नूर से इक दूजे की उलटते सभी यहाँ पर खाट । लोकतंत्र की हो रही सोलह दूनी आठ ॥ सोलह दूनी आठ, न अल्ला, राघव, माधव । ब्रह्मण, बनिया, जात, दलित, मुस्लिम या यादव ॥ कह जोशी कविराय बने सब एक नूर से । ऐसी बातें केवल मुँह से, दूर-दूर से ॥ (२) इलाहबाद में... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai

व्यंग्य

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[12 Apr 2009 01:54 AM]

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