nagarnama

. कभी न थमने वाला सफर हूं पसीजी रात के बाद का प्रहर हूं, हरे-भरे, घने-बने जंगलों पर इमारतें बोता कहर हूं मैं महानगर हूं, मैं महानगर हूं. सड़कों पर पड़ी है तहजीब ढूंढता अपने घर हूं, देश अब नहीं भाता तो विदेश की डगर हूं मैं महानगर हूं, मैं महानगर हूं. बी... [पूरी पोस्ट]
writer durgesh
views
21
upvote
1
downvote
0
rating
1
comments
4
[11 Apr 2009 12:20 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix