nagarnama
कभी न थमने वाला सफर हूं पसीजी रात के बाद का प्रहर हूं, हरे-भरे, घने-बने जंगलों पर इमारतें बोता कहर हूं मैं महानगर हूं, मैं महानगर हूं. सड़कों पर पड़ी है तहजीब ढूंढता अपने घर हूं, देश अब नहीं भाता तो विदेश की डगर हूं मैं महानगर हूं, मैं महानगर हूं. बी...
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durgesh
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[11 Apr 2009 12:20 PM]



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