पहाड़

हिमाल : अपना-पहाड़ पहाड़ / जब भी धूसर से नज़र आते हैं सोचता हूं / किसने किया ये सब ? किसने काटे पेड़ ? किसने हिलाए पहाड़ ? किसने मोड़ दिए नदियों के रास्ते ? एक दिन में नहीं हुआ / ये सब सबने थोड़ा-थोड़ा कुरेदा है इनको फिर दरक गए पहाड़ जहां कभी हरियाली थी आज धूसर उदासी ह... [पूरी पोस्ट]
writer जितेंद्र भट्ट

मेरी रचना

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[11 Apr 2009 10:25 AM]

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