आशिकों का कारवां
आशिकों का कुछ यूं कारवां बनता रहा जैसे शमां पे परवाना पिघलता रहा सूरज की अगन को पाने के लिए कुकनूस सदियों से राख बनता रहा चांद को ही पाना है चकोर का सबब इसीलिए वो रातभर भटकता रहा बाहें खोले बैठी है समुद्र में सीप बारिश का एक तुपका सीप में ढलता रहा यू...
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vijaymaudgill
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[11 Apr 2009 10:00 AM]



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