समय जो सबका पिता है
यह समझाने का समय नहीं है समझने का भी नहीं यह समझने और समझाने से बाहर निकल जाने का समय है समय से बाहर निकल जाने का समय सोचा जो, वह कहा नहीं कहा वह नहीं, जो सोचा कहने और सोचने के बीच फंसा है यह समय। जिद ने तर्क को पीछे ठेल दिया है वत्सलता को काठ मार गय...
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कपिलदेव
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[10 Apr 2009 14:13 PM]



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