एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा
कवि-बबुआजी झा "अज्ञात" एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा जतय जाँइ¸ जे करँइ¸ अपन छौ सबल पाँखि उन्मुक्त गगन छौ सुमधुर भाषा¸ प्रकॄति अहिंसक अपन प्रदेश¸ अपन सभ जन छौ मुदा कतहु रहि अर्जित जातिक मान सुरक्षित रखिहेँ सूगा¸ एतबा धरि तॊं करिहेँ सूगा उत्तम पद अधिकाधिक अ...
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सम्पादक: कतेक रास बात
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[10 Apr 2009 12:15 PM]



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