रुद्र का तृतीय नेत्र खोलना
प्रशस्त शस्त शैल मध्य चिर विविक्त कन्दरा शिला प्रगल्भ पुष्ट, व्याघ्र चर्म था बिछा हुआ अनादि आदि देव थे समाधि में रमे हुए सती वियोग का अथाह दाह प्राण में लिए विरक्त, भक्त, सृष्टि के सभी क्रिया कलाप से हरे त्रिलोक-ताप जो, जले विछोह ताप से समाधि साध कर...
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प्रताप नारायण सिंह
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[10 Apr 2009 06:56 AM]



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