ऊँची-ऊँची चट्टानों से
ऊँची-ऊँची चट्टानों से 'नीर' गिरा निर्झर कहलाया चोट लगी जो तन-मन मेरे जग निर्मोही देख ना पाया ! झर-झर,झर-झर बहता जाए दर्द को अपने सहता जाए कोई ना जाने पीर पराई लहू जिस्म का कहता जाए ! मेरे दर पे जो भी आया मैंने सबको प्यासा पाया प्यास बुझाई मैंने उसकी...
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निर्झर'नीर
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[10 Apr 2009 04:29 AM]



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