ज़रा ठहर जाओ

फुरसत के रातदिन अभी चराग़ जले हैं ज़रा ठहर जाओ दिल-ए-नादान मिले हैं ज़रा ठहर जाओ गुल-ए-गुलज़ार हुई है यहाँ की हर टहनी कई गुलाब खिले हैं ज़रा ठहर जाओ | पड़े हुए हैं मेरे बोसे तेरी राहों में कदम संभाल के रखो ज़रा ठहर जाओ तिरे ख्वाबों से हर एक खार को हटा दूँगा उनकी ताब... [पूरी पोस्ट]
writer अभिषेक'शफक़'
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[10 Apr 2009 02:43 AM]

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