उससे जुदा हो गया मैं...

संवेदना अप्रैल 09 मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था कि वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको हवाओं में लहराता आता था आंचल कि दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको कदम ऐसे अंदाज में उठ रहे थे कि आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको मगर उसने रोका, न उसने बुलाया न दामन ही पकड़ा, न मुझको बिठाया... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कुमार वर्मा
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[09 Apr 2009 14:15 PM]

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