कविता की किताब

मीमांसिकी कल की सुबह के बारे में कल वाले कल के पहले वाले कल ही सोच लिया जाय यह सोचते हुए, कल सोचा कि कल सुबह कविता वाली वह किताब पढूंगा दफतर जाने के पहले के वक्त में दूबे जी से मिलना क्या आज ही जरूरी है कल न भी मिले तो क्या इसतरह तो कविता वाली वह किताब कब पढ़ी... [पूरी पोस्ट]
writer कपिलदेव
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[08 Apr 2009 13:53 PM]

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