भाई समीर लाल जी द्वारा बिखरे मोती के अंतरिम विमोचन की रपट
दो दिन बीते. न कोई कमेंट, न अधिक ब्लॉग विचरण. कोई ब्लॉग वैराग्य जैसी बात भी नहीं बस शनिवार को लंदन रुकते हुए कनाडा वापसी की तैयारी है तो बस!! समयाभाव सा हो लिया है. इस बीच मेरी पहली पुस्तक ’बिखरे मोती’ भी पंकज सुबीर जी और रमेश हटीला के अथक परिश्रम के...
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संजय तिवारी ’संजू’
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[07 Apr 2009 20:15 PM]



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