खुश्की का टुकड़ा

राही मासूम रज़ा का साहित्य राही मासूम रजा आदमी अपने घर में अकेला हो और पड़ोस की रोशनियां और आवाजें घर में झांक रही हों तो यह साबित करने के लिए कि वह बिल्कुल अकेले नहीं है, वह इसके सिवा और क्या कर सकता है कि उन बेदर्द रोशनियों और आवाजों को उल्लू बनाने के लिए अपनी बहुत पुरानी याद... [पूरी पोस्ट]
writer डा. फीरोज़ अहमद
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[07 Apr 2009 18:36 PM]

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