अब तो मैं भूलने लगा था तुम्हें...
अप्रैल 09 अब तो मैं भूलने लगा था तुम्हें आज फिर आ गई हो जाने क्यों रंग और नूर का जहां बनकर एक खिलते गुलाब की मानिन्द इक चटकती हुई कली की तरह लम्हा लम्हा संवरती जाती हो नक्श बनकर उभरती जाती हो तुम चली जाओगी घड़ी भर में इतने वक्फे में सबसे मिल लोगी घर...
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अनिल कुमार वर्मा
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[07 Apr 2009 14:29 PM]



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