बहुत दिनों बाद एक कविता
शीर्षक विहीन एक उदास सी शाम बैठी है बिजली के तारों पर गुनगुनाती है कोई साठ के दशक का हिन्दी फिल्मी गीत दूर कल्पना में एक गाव की एक ध्वनि सुनती है तो टूटता है क्रम उसी पल सड़क के कोलाहल में सूरज शाम के कानो में आकर कहता है कब से बैठी हो . जाओ... कुछ का...
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DUSHYANT
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[06 Apr 2009 08:54 AM]



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