कुंवारेपन के किले की दरकती दीवार

मन उवाच..... वैसे मैं पहले भी ठीकठाक ही दिखता था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से मेरे चेहरे से कुछ ज़्यादा ही नूर टपकने लगा है। मुई नौकरी मिलते ही छोकरी वालों ने घर के आंगन में कदमताल करके ग़र्दो-ग़ुबार उड़ा रखा है। इतना छैला-बांका हो गया हूं कि सब की निगाह में किरकिरी... [पूरी पोस्ट]
writer मधुकर राजपूत
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[06 Apr 2009 00:00 AM]

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