अष्टभुजा की कविता ताम की या झाम की
जिससे नही पसीना निकला जिसमें मिट्टी नहीं लगी चलते चलते थक जाने की जिसमें इच्छा नहीं जगी वह इच्छा किस काम की इच्छा केवल नाम की जिस छाया में सिहरन लागे जिस छाया में दाम लगे उस छाया में रहना वर्जित उस छाया में आग लगे छाया किसी गोदाम की चंचल पूंजी घाम की...
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कपिलदेव
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[05 Apr 2009 16:08 PM]



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