मेरे अपने बारे में

मोहन का मन जब भी मैं सोचता हूं अपने बारे में कि मैं क्‍या हूं अंदर झांकता हूं तो पाता हूं कुछ भी नहीं मैं कभी सोचता हूं कि किसी कवि की लिखी किसी कविता के शब्‍द में लगी मात्रा की आवाज का सौंवा भाग भी नहीं हूं कभी सोचता हूं कि धरा पर लगे वृक्षों के पत्‍ते पर पडी... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन वशिष्‍ठ
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[05 Apr 2009 09:26 AM]

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