दीदार (सिर्फ तुकबंदी)
आज यादों के झरोखे से फिर एक कविता (तुकबंदी) निकाल कर लाया हूँ...कालिज कि कैंटीन में चाय पीते पीते बस यूँ ही हाथ चले और कागज पर कुछ लिख दिया ... आज मन किया तो ब्लॉग पर भी छाप रहा हूँ... दीदार सावन के महीने में...जब दिल धड़का था सीने में, नशा बाकी न बच...
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शोभित जैन
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[05 Apr 2009 08:19 AM]



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