"इश्क और हया"

फुरसत के रातदिन हया कहती है तो इस बात पे ता'ज्जुब कैसा इश्क़ फिर गर्द-ए-राह है यही किस्मत इसकी सिवा ज़िल्लत के इसकी जीस्त में कुछ भी तो नहीं ये सरे राह पड़ा है तो इस से हुब कैसा | इसकी खुद्दारियों ने सर कभी झुकने ना दिया ये पस-ए-संगेमरमर रहनेवाले क्या जानें इसके तो... [पूरी पोस्ट]
writer अभिषेक'शफक़'
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[05 Apr 2009 06:10 AM]

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