varsha
एक कतरा ज़िंदगी कभी आंसू कभी हंसी * कोशिश उठे, चले, बढ़े खोया, खोया, पाया रुकते-रुकते पहुंचे वो रही मंज़िल * कल तुम हंसते थे मैं हंसती थी तुम रोते थे मैं रोती थी हम थे साथ-साथ अब भी हम हंसते-रोते हैं अब हम अलग-अलग * दो में दो जोड़ कर चार बना लिया कभी...
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वर्षा
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[05 Apr 2009 03:49 AM]



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