''पुष्प की अभिलाषा''
चाह नहीं मैं सुरबाला के, गहनों में गूंथा जाऊँ. चाह नहीं प्रेमी माला में, बिंध प्यारी को ललचाऊँ . चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि डाला जाऊँ. चाह नहीं देवों के सिर पर चढूं भाग्य पर इठलाऊं . मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फ़ेंक. मातृभूमि पर श...
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ram shankar
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[04 Apr 2009 11:54 AM]



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