तीन का एक: फिर एक बार हिंदी फ़िल्में..
हिंदी फ़िल्मों पर लिखना , लिखते रहना सचमुच कलेजे का काम है. ऐसा नहीं है कि हिंदी साहित्य पर लिखना कलेजे का काम नहीं है, लेकिन साहित्य के साथ सहूलियत है कि आप किताब बंद कर देते हैं चिरकुटई ओझल हो जाती है, जबकि हिंदी फ़िल्मों की रंगीनियां आपका पी...
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Pramod Singh
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[03 Apr 2009 00:14 AM]



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