जब सांझ की बेला होती है...
मार्च 09 जब सांझ की बेला होती है में इस पीपल के साए में तालाब के तट पर आता हूं हम दोनों जहां पे मिलते थे दो पल के लिए दो क्षण के लिए फिर मिल के बिछड़ जाते थे हम इस बार मगर यूं बिछड़े हैं जैसे न कभी मिल पाए हों इस बार जो तट पर आया हूं दो पल के मिलन की...
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अनिल कुमार वर्मा
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[01 Apr 2009 11:53 AM]



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