चितवन .........( गीत )
तुम्हारी रसवंती चितवन ! और मदिर हो गई चाँदनी घूंघट से छन छन !! झरे मकरंद ,छंद, सिंगार , अलस ,मद,मान और मनुहार हो गया चकाचौंध दरपन ! तुम्हारी ................. चुभी तो नयन नीर भर गई झुकी तो पीर पीर कर गई उठी तो तार तार था मन तुम्हारी ...................
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ललितमोहन त्रिवेदी
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[01 Apr 2009 10:35 AM]



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