चितवन .........( गीत )

अनुरक्ति तुम्हारी रसवंती चितवन ! और मदिर हो गई चाँदनी घूंघट से छन छन !! झरे मकरंद ,छंद, सिंगार , अलस ,मद,मान और मनुहार हो गया चकाचौंध दरपन ! तुम्हारी ................. चुभी तो नयन नीर भर गई झुकी तो पीर पीर कर गई उठी तो तार तार था मन तुम्हारी ................... [पूरी पोस्ट]
writer ललितमोहन त्रिवेदी
views
20
upvote
3
downvote
0
rating
3
comments
4
[01 Apr 2009 10:35 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix