जब कोई महबूबा चांदनी ओढ़कर उतरती है तो कैसी लगती है....

kuch ehsaas सुबह मेहँदी महक रही थी बिस्तर पर मैं तो रातरानी सिरहाने रखकर सोया था होंठों पर गर्म साँसें अभी भी दहक रही थीं और पलकों पर आज फिर एक मोती झिलमिलाया था खुली खिड़की से जब झाँका था मैंने तो आसमा के आखिरी कोने पर लहराता दिखा था तुम्हारा रेशमी आँचल , जिसका... [पूरी पोस्ट]
writer pallavi trivedi
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[01 Apr 2009 03:33 AM]

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