जाते थे वनगमन को, हेरन लागे जुगाड़

युं ही, निट्ठल्ला... यूँ ही निट्ठल्ला.. यथानाम तथागुण ! कहीं दूर क्यॊ जाते हैं ? पिछली पोस्ट की प्रकाशन तिथि देख लीजिये... आज की डेट से डिफ़रेन्स जोड़ लीजिये, फिर मेरा योगदान घटा दीजिये.. यही है.. निट्ठल्लई ! इधर बड़ी साँसत रही, क्या लिखें.. क्या छोड़ें ? चलो असमंजस छोड़ो.. अ... [पूरी पोस्ट]
writer डा० अमर कुमार
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[31 Mar 2009 15:02 PM]

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