चिट्ठी है किसी दुखी मन की...
बर्तन की यह उठका-पटकी यह बात-बात पर झल्लाना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। यह थकी देह पर कर्मभार इसको खाँसी, उसको बुखार जितना वेतन, उतना उधार नन्हें-मुन्नों को गुस्से में हर बार, मारकार पछताना चिट्ठी है किसी दुखी मन की। इतने धंधे। यह क्षीणकाय- ढोती ही रह...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[31 Mar 2009 04:06 AM]



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