पलकों से टपके, टूटे से ख्वाब ढूंढता हूँ...
हर सुबह बिस्तर की सिलवटों में... पलकों से टपके, टूटे से ख्वाब ढूंढता हूँ... हांथों से खो गए हैं, कुछ रिश्तों के सिरे थे... उलझा कब से इनमे, बेहिसाब ढूंढता हूँ... ना पा सका हूँ, खुद को, अब उम्र कटती जाती, कल से ही हर कहीं पे, मैं आज ढूंढता हूँ... होते...
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मीत
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[30 Mar 2009 10:17 AM]



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