तुम ही तो थे.........
जानवर *~*~*~*~*~*~*~* तुम क्या जानों यादों में खो कर आँखें कितना रोती है, दिल में अपने दर्द समा कर आँखें कितना रोती है, तुम क्या जानों सावन का मौसम कितनी आग लगाता है, बारिश कि बुदों को छुकर आँखें कितना रोती है, अब तो छोटी सी बात पर भी यह दिल भर सा जा...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[30 Mar 2009 03:52 AM]



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