श्रद्धा पूजा आधार वही !!!
पथ के कंटक गुंथ ह्रदय मेरे, जिस पल भी व्याकुल करते हैं. सब ताप मेरे संताप मेरे, उन नयनो में घिर झरते हैं. उन अश्रु कणों के सागर में, आकंठ निमग्न अस्तित्व मेरा, जलधि बाहर क्योंकर आऊं, जो जल ही जीवन सार निरा. व्रत रक्षा स्नेह समर्पण का, वह पूर्ण प्रतिष...
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रंजना
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[30 Mar 2009 03:45 AM]



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