सूखा घाट ........ [कविता एवं स्वर] श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
सूखा घाट और तालाब पत्ते पीपल के सूख चुके हैं सारे ’बरमबाबा’ की डालें हिलती हैं जब हवा से, सुनायी देती है मुझे रुनझुन .... तुम्हारी नयी पायल की आवाज अब भी .... खड़कते हुये पत्तों में कैथे का पेड़ अब हो गया है बहुत बड़ा, सींचा था जिसे अक्सर कलश की बची...
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श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[30 Mar 2009 03:31 AM]



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