राजभाषा तथा हिंदी साहित्यकार.

Dhirendra Singh एक युग वह भी था जब हिंदी कार्यालयों की देहरी तक भी अपना प्रभाव निर्मित नहीं कर सकी थी। एक सामान्य धारणा थी कि हिंदी बातचीत और गानों-बजानों की भाषा है। यह मान्यता भी निर्मित हो चुकी थी कि हिंदी में कारोबारी अभिव्यक्तियाँ संभव नहीं है । भारतीय संविधान... [पूरी पोस्ट]
writer धीरेन्द्र सिंह
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[30 Mar 2009 01:33 AM]

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