पहले से ज्यादा बेरहम पाता हूं

मेरा मत बहुत कुछ खोया है मैंने गांव से दिल्ली के सफर में यह एहसास दिलाया मुझे आज बचपन के एक दोस्त ने अब मैं जब खुद को तलाशता हूं आईना में अपना चेहरा पहले से ज्यादा बेरहम पाता हूं। (कुछ दिनों पहले ऑफिस में बातचीत के दौरान विवेक ने मुझे कविता लिखने के लिए प्रे... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभाष कुमार झा
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[29 Mar 2009 11:39 AM]

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