यादों को किसने रोका है
ताउम्र हमको इक यही अफसोस रहेगा कि हम न मुस्कुरा सके आपकी तरह। सुरों और गीतों का अंबार था लगा, पर हम न गुनगुना सके आपकी तरह। (मुझे अपने कुछ पुराने शेर याद आ गए, जो कॉलेज के अंतिम दिनों में लिखे गए थे। उसे मैंने अब यों पूरा किया है - आज भी बातें पुरानी...
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ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)
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[29 Mar 2009 05:35 AM]



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