बाहर से यारी भीतर मनमुटाव है
बाहर से यारी भीतर मनमुटाव है यहाँ के चलन का अजब रख - रखाव है छोड़ जाए महफिल तो भूल जाते है लोग अपनों का अपनों पर ऐसा ही घाव है अनेको तूफान तो सतह पर खामोश है समंदर में लगता बहुत गहरा तनाव है तन्हा हुए इश्क में दुनिया से बेखबर ठोकरे खाई बेशुमार फ़िर भी...
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Rahul kundra
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[28 Mar 2009 06:55 AM]



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