लोकतंत्र के कहांर ही कहर बने.

संजीवनी लोकतंत्र के कहांर ही कहर बने। देश और समाज के लिए ज़हर बने ॥ आतंक के आरोप में जो दोषसिद्ध हैं- वो ही समाजवाद के हैं पक्षधर बने ॥ सबको पता है आती है हर साल यहाँ बाढ़ - किस हाल में नदी के तटों पर हैं घर बने॥ कीचड उछालते हैं या हैं दाग दिखाते- वे सिर्फ़... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[27 Mar 2009 08:34 AM]

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