संत्रास
सहरा की धूप में जो जल रहा था, वेदना के गरल से जो गल रहा था, काल के निर्मोह हाथों पल रहा था, सुधा का प्याला उसे तुमने पिलाया । मौत के आगोश से तुमने बचाया ॥ जीवन का संघर्ष जिसको छल रहा था, भरी जवानी में भी जो ढ़ल रहा था, स्वयं का जीवन जिसको खल रहा था, अ...
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Kavi Kulwant
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[26 Mar 2009 06:12 AM]



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