कसम को तोड़ देता मैं
गर अपने कसमे वादों की मुझे परवाह ना होती तुम्हारी ज़ब्त करने की कसम को तोड़ देता मैं तुम्हारे एक इशारे भर पे मैने हाथ बाँधे हैं नहीं तो इस कज़ा के रुख़ को भी बस मोड़ देता मैं | मेरे गमखाना-ए-दिल में फकत तेरी ही यादें हैं फकत तेरे वो शिकवे हैं फकत मेर...
[पूरी पोस्ट]
अभिषेक"शफक़"
27
8
0
8
5
[26 Mar 2009 02:00 AM]



Shuffle








