आखि़री रंग की नीलाई
ख़्वाब का दर शायद खुला रह गया था...पांव एक बार बाहर निकला और वापसी की राह धुंधला गई। बाहर की दुनिया में सात रंग थे..दिखते तभी थे जब उनपर नज़र रखो, पाबंदी इतनी कि आंखें झपक न जाएं। .उसने दोनों हाथों में भरकर उन्हें बंद कर लिया...इतना कसकर कि उड़ न सक...
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शायदा
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[25 Mar 2009 17:14 PM]



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