मंजिल की विसात ही क्‍या

मोहन का मन मंजिल ही न रही अब कोई रास् ‍ ता भी मैं भटक गया सोचा था साथ दे देंगे मेरे कदम चलेंगे मेरे साथ दूर तलक मिल जाएगी मंजिल होगी आसान डगर कदम ही मेरा साथ छोड गए तो मंजिल की विसात ही क् ‍ या अब अपनों ने मुंह फेर लिया दुनिया का भरोसा क् ‍ या करना जब दोस् ‍ त... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन वशिष्‍ठ
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[25 Mar 2009 10:37 AM]

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