कदम ही मेरा साथ छोड गए तो मंजिल की क्‍या विसात

मोहन का मन मंजिल ही न रही अब कोई रास्‍ता भी मैं भटक गया सोचा था साथ देंगे मेरे कदम चलेंगे मेरे साथ दूर तलक मिल जाएगी मंजिल होगी आसान डगर कदम ही मेरा साथ छोड गए तो मंजिल की क्‍या विसात अब अपनों ने मुंह फेर लिया दुनिया का भरोसा क्‍या करना जब दोस्‍त ही दुश्‍मन बन... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन वशिष्‍ठ
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[25 Mar 2009 06:17 AM]

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