पीर के पन्ने पिचहत्तर
पीर के पन्ने पिचहत्तर सांत्वना के शब्द सत्रह एक यह अनुपात लेकर चल रही है ज़िन्दगानी जागती है भोर की पहली किरण की दस्तकों से और चढ़ती धूप के संग पीर की चढ़ती जवानी सांझ को ढलती हुई यह देख कर, ज्यादा निखरती रात में यों महकती है, जिस तरह से रात रानी एक यह...
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Geetkaar
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[24 Mar 2009 21:36 PM]



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