मुस्कान तुम्हारी

सहज साहित्य(SAHAJ SAHITYA) आगे बढ़ो तुम पार अँधेरे के । दो क़दम दूर हैं द्वार सवेरे के॥] मुस्कान तुम्हारी पीछे तो केवल छाया है यही तुम्हारा सरमाया है । तुम अपनों को ढूँढ़ रहे हो कोई साथ नहीं आया है । देखी है मुस्कान तुम्हारी सब कुछ आँसू से पाया है । जिसको तुमने गीत कहा था चुपके र... [पूरी पोस्ट]
writer सहज साहित्य
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[24 Mar 2009 07:24 AM]

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