मैं समय हूँ ...
कल से चार पंक्तियां जहन मे चल रही है एक मुक्तक के रूप मे , सबसे पहले आप सब से ही बांट रहा हू , कि - चले हैं इस तिमिर को हम , करारी मात देने को जहां बारिश नही होती , वहां बरसात देने को हमे पूरी तरह अपना , उठाकर हाथ बतलाओ यहां पर कौन राजी है , हमारा सा...
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डा. उदय ’ मणि ’
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[23 Mar 2009 12:40 PM]



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