क्षितिज के पार तो नवकल्पना है [कविता] ...
मैं देखना चाहता हूँ क्षितिज के पार कुहासा ढक लेता है आखों की रोशनी चाहता है तोड़ दें स्वप्न उगने की कल्पना मैं आक्रोश से मूँद लेता हूँ आँख की पुतलियां देखने को क्षितिज के पार का अदभुत विहान कुहासा घना और घना हो जाता हैं क्षितिज के पार का द्रश्य मानो...
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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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[23 Mar 2009 07:46 AM]



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