ग़ज़ल " फ़ना जब भी हमारे राज़ होंगे.
फ़ना जब भी हमारे राज़ होंगे, अलग जीने के ही अन्दाज़ होंगे । खफ़ा उनसे मैं होना चाहता हूँ, मग़र डर है कि वो नाराज़ होंगे । ज़रा पन्नों को हौले से पलटना, वहाँ नाज़ुक भी कुछ अल्फ़ाज़ होंगे । बहुत महफ़ूज़ है पिंजड़े में चिड़िया, गगन में तो शिकारी बाज़ होंगे । वो दिन कब...
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शरद तैलंग
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[22 Mar 2009 00:19 AM]



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