वक्त भर देता है ...

संजीवनी वक़्त भर देता है हर एक ज़ख्म की गहराईयाँ । फिर भी रह जाती हैं क्यों ये मातमी परछाइयाँ ॥ या खुदा एक पल में दिखता दो तरह ज़लवा तेरा- एक तरफ मातम का डेरा एक तरफ शहनाइयाँ ॥ स्याह रातों से न जाने दिल क्यों घबराने लगा- साँप सी डसती हैं मुझको शाम की तन्हाइया... [पूरी पोस्ट]
writer विनय ओझा 'स्नेहिल'
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[10 Dec 2007 05:30 AM]

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